रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के उद्देश्य, गुण और दोष (Regulating Act 1773)

भारतीय संविधान का उद्विकास

रेग्युलेटिंग एक्ट 1773

रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 की अन्य विशेषताएँ:

इस रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 अधिनियम के द्वारा ई आई सी के राजनीतिक और राजस्व संवंधी अधिकार ब्रिटिश संसद के अधीन ला दिए गए। अर्थात निदेशक मण्डल के द्वारा इन 2 मामलों में गवर्नर जनरल से प्राप्त रिपोर्ट को संसदीय समिति के समक्ष प्रस्तुत करना होता। जिसकी स्वीकृति के पश्चात् ही ये फैसले लागू होते थे। यही नहीं, प्रेंसीडेसी के गवर्नर अन्य ब्रिटिश प्रांतो के गवर्नर था। गवर्नर जनरल या लेफ्टिनेट गवर्नर/कमाण्डर इन चीफ तथा परिषद के सदस्यों की नियुक्ती संबंधी निदेशक मंडल के फैसलों को तभी विधि मान्यता प्राप्त होती थी। जब ब्रिटिश संसद उसे स्वीकृति दे दें।

अत: पहली बार ई आई सी के क्रियाकलाप को संसद की निगरानी में लाया गया और यहीं से भारत में धीमी और कमजोर ही सही कानून के शासन की शुरूआत हुई। नागरिक और सैन्य मामलों में भी सहपरिषद गवर्नर जनरल के फैसले की प्रति संसद में प्रस्तुत करनी होती थी। पुन: इसमें निम्नलिखित प्रावधान किए गए।

रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के प्रावधान:

  • बंगाल के गवर्नर का दर्जा बढ़ाकर गवर्नर जनरल कर दिया गया तथा बॉम्बें व मद्रास प्रेसीडेंसी वे उसे अधिक्षण या निगरानी पर्यवेक्षण का अधिकार दे दिया गया। अर्थात इन प्रेसी़डेसी की सरकारे राजस्व, राजनीति, प्रशासन और स्थानीय शासकों से समझौते, संधि आदि मामलों में पहले गवर्नर जनरल से अनुमति प्राप्त करती थी तत्पश्चात् उसे लागू करती थी ।( इस अधिनियम से पूर्व प्रेंसीडेसी की सरकारे सीधे निदेशक मंडल के प्रति उत्तरदायी थी)
  • इस अधिनियम के पूर्व भारत में ब्रिटिश कार्यपालिका के ऊपर किसी न्याय पालिक का कोई नियंत्रण नहीं था इस दोष को दूर करने के लिए कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट गठित करने का फैसला लिया गया।
  • कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय को निम्नलिखित 4 विषयों का क्षेत्राधिकार सौंपा गया।
    • 1- दीवानी
    • 2- फौजदारी
    • 3- नौसेना
  • धार्मिक मामले (इसाइयत मामलें)
  • सिविल सेवा में सुधार-बंगला, बिहार, उड़ीसा में भू-राजस्व की वसूली के लिए जो सुपर वाइजर नियुक्त हुए थे उन्हे कलैक्टर नाम दे दिया गया । और इन्हे मजिस्ट्रेट का अधिकार भी दिया गया।

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के दोष

इस अधिनियम के तीन प्रमुख दोष है-

  1. सपरिषद गवर्नर जनरल आपस में मतभेद के कारम प्राय: कोई निर्णय नहीं ले पाता था।
  2. प्रेसीडेंसी और सपरिषद गवर्नर जनरल के बीच अधिकारिता पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थी जिससे होनों के बीच प्रय: संधर्ष की स्थिति बन जाती थी।
  3. कलकत्ते के सर्वोंच्च न्यायालय और अधिनस्थ न्यायालयों के बीच अधिकारिता स्पष्ट नहीं थी।

FAQ (Frequently Asked Question):

प्र01- कोलकाता में उच्चतम न्यायालय की स्थापना किस अधिनियम दूारा किया गया?

उ0- कोलकाता में उच्चतम न्यायालय की स्थापना रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 के दूारा।

प्र02- ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर संसदीय नियंत्रण का प्रथम प्रयास किस अधिनियम दूारा किया गया?

उ0- ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर संसदीय नियंत्रण का प्रथम प्रयास रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 के दूारा किया गया।

प्र03- किस अधिनियम दूारा कम्पनी में गर्वनर जनरल का पद सृजित किया गया?

उ0- कम्पनी में गर्वनर जनरल का पद 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट दूारा सृजित किया गया।

प्र04- रेग्युलेटिंग एक्ट लागू होने के समय बंगाल का गवर्नर जनरल कौन था?

उ0- रेग्युलेटिंग एक्ट लागू होने से पहले बंगाल का गवर्नर रॉबर्ट क्लाइव थे। लेकिन रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के लागू होने के बाद बंगाल के प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग थे।

Final Words-

मैं उम्मीद करता हूँ आपको ये रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के उद्देश्य, गुण और दोष (Regulating Act 1773) बहुत ज्यादा पसंद आया होगा। अगर आपको भारतीय संविधान का प्रथम रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 पोस्ट पसंद आया हैं तो हमें कमेंट करके जरूर बताये ताकि हम आपके लिये और भी अच्छे तरीके से नये नये टॉपिक लेकर आयें। जिससे आप अपने किसी भी एग्जाम की तैयारी अच्छे से कर सकें। धन्यावाद

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