भारत सरकार अधिनियम 1919 के उद्देश्य, गुण और दोष (Government of India Act 1919)

भारत सरकार अधिनियम 1919 की प्रष्ठभूमि

भारत सरकार अधिनियम 1919 भारतीयों के स्वशासन की माँग को पूर्ण न कर सका। साम्प्रदायिक आधार पर मतदान प्रणाली की नीति से उत्पन्न असंतोष, 1916 में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य समझौता, 1916-17 में प्रकाशित मेसोपोटामियाँ आयोग की रिपोर्ट में अंग्रेजों को भारत में शासन के लिए अक्षम बताया जाना, होमरुल आंदोलन से भारतीयों में जागृत, राष्ट्रीय चेतना तथा प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सहयोग की अपेक्षा के मद्देनजर तत्कालीन भारत सचिव ‘मोन्टेग्यू’ ने 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश सरकार को प्रस्तावित सुधारों की घोषणा की, जिसमें सर्वप्रथम भारत को स्वतंत्र जोमीनियन (स्वशासन) की स्थिति प्रदान करने की बात कही गयी थी।

इसके पश्चात मोन्टेग्यू भारत आये और गर्वनर जनरल चेम्सफोर्ड तथा अन्य नेताओं से शिमला में विचार विमर्श किया। तदोपरान्त जुलाई 1918 में मोन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित किया। इस संयुक्त रिपोर्ट के आधार पर ही “भारत शासन अधिनियम, 1919” पारित किया गया।

भारत सरकार अधिनियम 1919

Government of India Act 1919

भारत सरकार अधिनियम 1919 मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार को पारित करने के कारण

  • भारत सरकार अधिनियम 1919 को मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से भी जाना जाता हैं।
  • होमरूल लीग/आंदोलन की भूमिका।
  • लखनऊ पैक्ट/समझौता।
  • कांग्रेस के दो गुरुपों का विलय।

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भारत सरकार अधिनियम 1919 के प्रमुख प्रावधान

  • इस अधिनियम में सर्वप्रथ ‘उत्तरदायी शासन’ शब्द का स्पष्ट प्रयोग किया गया था।
  • 1793 से भारत सचिव का खर्च भारत के राजस्त से दिया जाता था। अब यब खर्च ब्रिटिश राजस्व से दिये जाने का प्रावधान किया।
  • भारत परिषद के सदस्यों की संख्या न्यूनतम-8 तथा अधिकतम-12 निश्चित की गयी।
  • भारत सचिव की सहायता के लिए सर्वप्रथम एक ‘हाई कमिश्नर’ की नियुक्ति की गयी।
  • इस अधिनियम द्वारा पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनायी तथा महिलाओं को भी मताधिकार दिया गया।
  • साम्प्रदायिक आधार पर निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए इसे सिक्खों, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा यूरोपियों पर भी लागू कर दिया गया।
  • 1919 के भारत शासन अधिनियम की मुख्य विशेषता प्रान्तों में द्वैध-शाशन (Dyarchy) की स्थापना थी।

Government of India Act 1919 के द्वारा केंद्रीय विधानमंडल में परिवर्तन

  • 1909 मे मुस्लिमो को पृथक आरक्षण दिया गया था, किन्तु 1919 में यूरोपीय ईशाइयों व सिखों को भी आरक्षण दे दिया
  • केंद्रीय विधानमंडल पहली बार द्विसदनीय बना।
  • राज्य परिषद को उपरले सदन(हाउस) का नाम दिया गया  इसके सदस्यों को मानीय कहा जाना था। यह स्थायी सदन नहीं था। (आज की तरह) इसे गवर्नर जनरल भंग कर सकता था। सामान्य रूप से इसकी अवधि 5 वर्ष होनी थी।
  • गवर्नर जनरल इसके मनोनीत सदस्यों को कुछ निश्चित योग्यता के आधार पर जैसे कि वे पूर्व में विधान परिषद के सदस्य हो, नामांकित करता था। इसके निर्वाचित सदस्यों के लिए भी योग्यताऐं तय थी जैसे किसी यूनिवर्सिटी के सिनेट का सदस्य होना।
  • यदपि इस अधिनियम के अन्तर्गत निर्वाचन की व्यवस्था की गई किन्तु इसमें महिलायें मतदाता नहीं हो सकती थी और केवल वहीं लोग मतदान कर सकते थे जिनकी न्यूनतम सालाना आय 10 हजार रूपये हो (आयकर की दृष्टि से) अथवा वे  750 रूपये सालाना भू-राजस्व देते है।

भारत सरकार अधिनियम 1919 के द्वारा प्रांतीय सरकार में परिवर्तन

डाई आर्की (द्वैध शासन-प्रत्यक्ष )-

  1. हस्तातरित- कृषि, उघोग, स्थानीय स्वशासन, लोक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, सार्वजनिक निर्माण , जन पुस्तकालय, इत्यादि को हस्तांतरित में रखा गया।
  2. आरक्षित- कानून व व्यवस्था, भू-राजस्व , पुलिस , सिंचाई, वित्त, वायलर व गैस, आपराधिक मामलें खनिज इत्यादि आरक्षित विषय थे।

भारत सरकार अधिनियम 1919 के दोष

  • विषयों का कृत्रिम विभाजन न केवल संसदीय परम्परा का विरोधी था बल्कि शासन के किसी भी स्वरूप के लिए अनउपयुक्त था इसलिए साइमन आयोग जो 1927 में इस अधिनियम की प्रगति की समीक्षा के लिए भारत आया था। उसने भी इसकी आलोचना की। उसकी आलोचना के बाद ही 1935 में इसे प्रांतो से हटा दिया गया था।
  • इस अधिनियम का सबसे बड़ा दोष यह था कि इसमें साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की विस्तार किया गया – अब यूरोपीय ईशाइयों, सिखों को पृथक निर्वाचन क्षेत्र दे दिए गए।
  • इस अधिनियम के अन्तर्गत विषयों का अतिच्छादन (घोलमेल) हो गया था। – यह स्पष्ट ही नहीं था कि कृषि का विकास कौन करेगा वह जो भू-राजस्व बसूलता हैं और जिसके हाथ में सिंचाई है अथवा वह जिसे कृषि भूमि और कृषि उपज के प्रबंध का दायित्व दिया गया था।
  • इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रांतो को मिलने वाले विषय प्रत्ययोजन के आधार पर मिले थे। अर्थात विषय वास्तव में केन्द्र के होते थे जो अपनी सहुलीयत से जब चाहे प्रंतो को विषय दे सकता था अथवा ले सकता था।  महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के कई नेताओं ने (नव चेन्जर्स) 1920 में इसके अन्तर्गत होने वाले चुनाव के बहिष्कार का फैसला लिया।
  • असहयोग आंदोलन
  • 1927- साइमन आयोग
  • 1928- मोती लाल नेहरू रिपोर्ट
  • 1930- (नवम्बर) – 1932 (दिसम्बर) – तीन गोलमेज सम्मेलन
  • 1932 का रैम्जे मैक्डोनाल्ड रिपोर्ट द्वारा साम्प्रदायिक पंचार्ट की घोषणा व पूना पैक्ट
  • 1934 – का लोथियम रिपोर्ट

FAQ (Frequently Asked Question):

प्र01- 1919 के भारतीय सरकारी एक्ट की मुख्य विशेषता क्या थी?

उ0- इस अधिनियम के द्वारा भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग की स्थापना के लिए प्रदान किया गया था।

प्र02- भारत शासन अधिनियम 1919 क्या है?

उ0- भारत शासन अधिनिम 1919 को मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम के नाम से भी जाना जाता हैं। लॉर्ड मांटेग्यू ने 20 अगस्त, 1917 को ब्रिटिश संसद में यह घोषणा की थी कि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है।

प्र03- कौन सी समिति भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत स्थापित की गई थी?

उ0- जुलाई 1918 में मान्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित किया। इस संयुक्त रिपोर्ट के आधार पर ही “भारत शासन अधिनियम, 1919” पारित किया गया।

प्र04- 1919 के अधिनियम में वैध शासन Dyarchy धारणा को जिस व्यक्ति ने परिचित कराया वे कौन थे?

उ0- 1919 के अधिनियम में वैध शासन Dyarchy धारणा भारत सचिव लॉर्ड मांटेग्यू की देन थी।

Final Words-

मैं उम्मीद करता हूँ आपको ये भारत सरकार अधिनियम 1919 (Government of India act 1919) के उद्देश्य, गुण और दोष बहुत ज्यादा पसंद आया होगा। अगर आपको भारतीय संविधान का भारत सरकार अधिनियम 1919 (मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) पोस्ट पसंद आया हैं तो हमें कमेंट करके जरूर बताये ताकि हम आपके लिये और भी अच्छे तरीके से नये नये टॉपिक लेकर आयें। जिससे आप अपने किसी भी एग्जाम की तैयारी अच्छे से कर सकें। धन्यावाद

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