द्वैध शासन के गुण और दोष, द्वैध शासन प्रणाली (Diarchy System)

दोस्तों जब हम किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की बात करते हैं, तो आधुनिक भारत के द्वैध शासन के गुण और दोष (Merits and Demerits of Diarchy) अर्थात द्वैध शासन प्रणाली से जुड़ा एक या दो प्रश्न जरूर मिल जाते हैं। ऐसे में आपको द्वैध शासन को का भी गहन अध्ययन करना चाहिए। जिससे कि आपको प्रश्नो में बढ़त मिल सके।

आज की इस पोस्ट में हम आपको द्वैध शासन प्रणाली क्या हैं, भारत में द्वैध शासन की शुरुआत कब हुई, द्वैध शासन के गुण और दोष (Merits and Demerits of Diarchy) और द्वैध शासन से जुड़ी जानकारी बिल्कुल आसान भाषा में डिटेल में जानेंगे। तो आइये जानते हैं, जिससे आपको परीक्षा में इससे जुड़े प्रश्न करने में बहुत मदद मिलेगी, तो आइये जानते हैं।

द्वैध शासन के गुण और दोष

द्वैध शासन प्रणाली क्या हैं? | What is Diarchy

(Diarchy) द्वैध शासन को हम दोहरी सरकार के रूप में भी जानते है, वास्तव में द्वैध शासन सरकार की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें दो व्यक्ति या समूह संयुक्त रूप से जनता पर शासन करते हैं, अर्थात जब दो सरकारे एक साथ मिलकर शासन करती हैं, तो उसे द्वैध शासन प्रणाली (Diarchy System) कहते हैं।

इसी तरह भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान भारत सरकार अधिनियम 1919 के द्वारा द्वैध शासन व्यवस्था की शुरुआत की गई थी। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य प्रशासन की दोहरी प्रणाली प्रदान करके ब्रिटिश भारत के प्रांतों में सीमित स्वशासन की शुरुआत करना था। इस प्रणाली के तहत कानून और व्यवस्था जैसे कुछ विषय ब्रिटिश गवर्नर के नियंत्रण में थे, जबकि शिक्षा और सार्वजनिक कार्य जैसे अन्य निर्वाचित भारतीय मंत्रियों के नियंत्रण में थे।

द्वैध शासन प्रणाली ब्रिटिश भारत के प्रांतों में लागू की गई थी, लेकिन रियासतों में लागू नहीं की गई थी। यह एक अस्थायी उपाय था। लेकिन यह 1935 तक बना रहा। बाद में इसे नये अधिनियम के द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, अर्थात प्रांतो से द्वैध शासन को हटा दिया गया। इससे प्रातो को पूरी स्वतंत्रता मिल गई। अत: प्रांतों में पूरी तरह से एक जिम्मेदार सरकार की शुरुआत हुई।

द्वैध शासन का सिद्धांत सबसे पहले लियोनेल कर्टिस ने अपनी पुस्तक “डायर्की” में दिया था। बाद में यह द्वैध शासन का सिद्धांत 1919 ई. में ‘भारतीय शासन अधिनियम, 1919‘ के द्वारा लागू किया गया, जिसके अनुसार प्रांतों में द्वैध शासन स्थापित किया गया।

द्वैध शासन प्रणाली के आलोचकों ने यह तर्क दिया कि यह अक्षम थी, और इसने भारत में जिम्मेदार सरकार के विकास में बाधा उत्पन्न की। हालाँकि, इसे भारत के लिए अधिक स्वायत्तता सरकार बनाने की दिशा में एक कदम के रूप में देखा गया, और इसने भारतीयों को अपने देश के प्रशासन में शामिल करने के लिए प्रेरित भी किया।

द्वैध शासन के गुण और दोष (Merits and Demerits of Diarchy)

नीचे आपकी सुविधा के लिए हमने द्वैध शासन के गुण और दोष को अलग अलग हैडिंग में बताया हैं ताकि आप अच्छे से समझ सको, तो आइये जानते द्वैध शासन के गुण और दोष के बारे में-

द्वैध शासन के गुण (Merits of Diarchy)

  • संयुक्त सरकार और निर्णय लेना: द्वैध शासन प्रणाली में मौजूदा सत्ता दो अलग-अलग शाखाओं या समूहों के बीच विभाजित होती है, अर्थात एक ही राज्य में जब दो सरकारे शासन करती हैं तो शक्ति के अधिक संतुलित वितरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में विभिन्न समूहों की अधिक भागीदारी की अनुमति होती हैं। जिससे निर्णय लेने में काफी आसानी होती हैं।
  • विभिन्न दृष्टिकोणों और हितों का प्रतिनिधित्व: एक द्वैध प्रणाली में अलग-अलग समूहों और समुदायों को प्रतिनिधित्व करने और उनकी आवाज़ सुनने का अवसर मिलता है। जिससे अधिक समावेशी और न्यायसंगत शासन हो सके।
  • स्थिरता और समझौते की संभावना: शासन के लिए अधिक सहयोगी दृष्टिकोण की अनुमति देकर, द्वैध शासन स्थिरता और समझौते को बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि विभिन्न समूह एक साथ काम करने में सक्षम होते हैं। जो सभी पक्षों को एक अच्छा समाधान खोजने में सहायता करते हैं। इससे शासन और सामाजिक व्यवस्ता में स्थिरता बनी रहती हैं।
  • सत्ता का विकेंद्रीकरण: द्वैध शासन प्रणाली, सरकार का एक विकेंद्रीकृत रूप है, जो स्थानीय सरकार को निर्णय लेने के लिए अधिक शक्ति देता हैं, जिससे अधिक कुशल और प्रभावी शासन हो सके और कुछ परेशानियां न आये।
  • नियंत्रण और संतुलन: द्वैध शासन प्रणाली नियंत्रण और संतुलन की एक बनाता है, जो किसी एक स्थानीय सरकार या समूह को बहुत शक्तिशाली बनने से रोकने में मदद करता है, और सरकार में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता लाता हैं।

द्वैध शासन के दोष (Demerits of Diarchy)

  • सरकारों के बीच समन्वय और संचार में कठिनाई: एक द्वैध शासन प्रणाली में सरकार या समूहों के बीच समन्वय और संचार बहुत ही चुनौतीपूर्ण होता हैं। जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में अक्षमता और देरी हो सकती है। कई बार तो निर्णय लिया ही नहीं जाता अर्थात बाधाएँ आती हैं।
  • गतिरोध और ग्रिडलॉक की संभावना: द्वैध शासन प्रणाली गतिरोध और ग्रिडलॉक की संभावना पैदा करती हैं, जहां सरकारें प्रमुख मुद्दों पर समझौता करने में असमर्थ हो जाती हैं, जिससे सरकार में गतिरोध पैदा होता है।
  • सरकारों के बीच शक्ति असंतुलन: द्वैध प्रणाली में एक जोखिम होता है कि एक सरकार या समूह दूसरे की तुलना में अधिक शक्तिशाली होता हैं। जिससे शक्ति का असंतुलन होता हैं, और सरकार में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी हो सकती है।
  • सीमित नियंत्रण: केंद्र सरकार का स्थानीय सरकार पर सीमित नियंत्रण होता हैं। जिससे समन्वय की कमी और अक्षमता हो जाती हैं।
  • क्षेत्राधिकार का ओवरलैपिंग: अलग-अलग शाखाओं के पास अलग-अलग शक्तियां और जिम्मेदारियां होने के कारण अधिकार क्षेत्र में स्पष्टता की कमी देखने को मिलती हैं। जिससे देरी, भ्रम और अक्षमता आदि हो सकती है।
  • बढ़ी हुई लागत: एक द्वैध शासन प्रणाली सरकार की लागत में वृद्धि करती हैं, क्योंकि विभिन्न शाखाओं के बीच कार्यों और सेवाओं का दोहराव होता हैं। जिससे सरकार के खर्चों में वृद्धि होती हैं।
  • स्पष्ट निर्णय लेने की प्रक्रिया का अभाव: एक द्वैध प्रणाली में स्पष्ट निर्णय लेने की प्रक्रिया का अभाव होता हैं। जिससे सरकारें स्पष्ट रूप से निर्णय नहीं ले पाती हैं।
  • प्रशासन में जटिलता: द्वैध शासन लागू करने के पश्चात प्रशासन में जटिलता देखने को मिलती और सरकार प्रणाली जटिल और नेविगेट करने में कठिन हो जाती है। जिससे नागरिकों के लिए प्रक्रिया को समझना और भाग लेना बहुत कठिन हो जाता है।
  • परस्पर विरोधी हितों की संभावना: विभिन्न सरकारों में परस्पर विरोधी हित और लक्ष्य हो सकते हैं। जिससे सहयोग और प्रगति की कमी आ जाती हैं।
  • कुशल कार्यान्वयन का अभाव: इसमें नीतियों का कार्यान्वयन कठिन हो जाता हैं। जिससे प्रमुख मुद्दों की रफ्तार में तेजी नहीं आती।

द्वैध शासन के गुण और दोष FAQs

Q1. द्वैध शासन प्रणाली के जनक कौन है?

द्वैश शासन प्रणाली के जनक ‘लियोनेल कार्टिस‘ को माना जाता हैं। यह एक अँग्रेज थे। इन्होंने सबसे पहले इस सिद्धांत को अपनी पुस्तक ‘डायर्की‘ में छापा था। लेकिन बाद में यह सिद्धांत भारत सरकार अधिनियम 1919 के द्वारा भारतीय प्रांतो में लागू हो गया।

Q2. भारत में दोहरी सरकार किसने लागू की?

अगर देखा जाये तो भारत में दोहरी सरकार का उदाहरण बंगाल हैं, क्योंकि बंगाल में नवाब के साथ ही सबसे पहले 1765 ई. में रॉबर्ट क्लाइब ने दोहरी सरकार लागू की थी। जिसको वारेन हेस्टिंग से समाप्त कर दी थी। लेकिन पूरी तरह से द्वैध शासन 1919 में लागू किया था।

Q3. भारत में द्वैध शासन कब से कब तक चला?

भारत में द्वैध शासन 1919 ई. में भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत में लागू की गई थी, और यह 1935 ई. तक बनी रही। बाद में इसे भारत सरकार अधिनियम 1935 के पारित होने के साथ ही समाप्त कर दिया गया। भारत मे द्वैध शासन लगभग 16 वर्ष तक रहा।

Q4. भारत में द्वैध शासन का अंत कब हुआ?

भारत सरकार अधिनियम 1935 के पारित होने के साथ ही भारत में द्वैध शासन आधिकारिक रूप से 1935 में ही समाप्त हो गया। इस अधिनियम ने 1919 से शुरू हुए ब्रिटिश भारत में द्वैध प्रणाली को समाप्त कर दिया और इसने मौजूदा सरकार को एक नई एकल प्रणाली में बदल दिया, जहाँ केंद्र सरकार को अधिक शक्ति म। वहीं प्रांतो को कम शक्तियां दी गई।

Q5. द्वैध शासन का अर्थ क्या होता है?

द्वैध शासन का अर्थ होता हैं कि जब दो शासक किसी स्थान पर एक साथ शासन करते हैं, तो उसे द्वैध शासन कहते हैं। जब दो सरकारे एक मिलकर शासन करती हैं, तो वो द्वैध शासन के अन्तर्गत आती हैं।

Final Words-

मैं उम्मीद करता हूँ आपको ये द्वैध शासन प्रणाली तथा द्वैध शासन के गुण और दोष (Merits and Demerits of Diarchy) बहुत ज्यादा पसंद आया होगा। अगर आपको Indian Polity का द्वैध शासन क्या हैं, द्वैध शासन की शुरुआत कब हुई और द्वैध शासन के गुण और दोष (Merits and Demerits of Diarchy) से जुड़ा पोस्ट पसंद आया हैं तो हमें कमेंट करके जरूर बताये ताकि हम आपके लिये और भी अच्छे तरीके से नये नये टॉपिक लेकर आयें। जिससे आप अपने किसी भी एग्जाम की तैयारी अच्छे से कर सकें। धन्यवाद

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